जोड़ों का दर्द :
अनेक प्रकार की बात व्याधियों में गठिया काफी विषम रोग है, जिसकी चिकित्सा कठिन तो है लेकिन दु: साध्य नहीं है | इस लेख में कुछ ऐसे दिशानिर्देश है जो बीमारी के आगाज से पूर्व अत्यंत उपयोगी सिध्द हो सकते है | गठिया या आमवात रोग जोड़ों के दर्द से संबंधित है जो वर्तमान में युवाओं को भी अपने घर में ले रहा है और युवावस्था में भी लोगों को होने लगा है | इस रोग से पीड़ित लोगों को दैनिक कामकाज में भी बहुत तकलीफ का सामना करना पड़ता है |
बीमारी के बचाव कैसे करे -
गठिया रोग से बचने के लिए इसके कारणों पर ध्यान देना आवश्यक है | यह रोग अनुवांशिक भी हो सकता है | इसलिए अगर परिवार में यह रोग है और एसिड ज्यादा बनता है तो मांस मधपान भरी भोजन इत्यादि की मात्रा कम कर दें एवं योग आसन तथा सही तरीके से नियमित व्यायाम करें | खुली हवा में सैर और संयमित पौष्टिक आहार अपनाएं तो रोग से बचा जा सकता है |
आयुर्वेद के अनुसार हड्डी और जोड़ों में संतुलित वायु का निवास होता है | वायु के असंतुलन से जोड़ भी प्रभावित होते है | अत: वायु गड़बड़ा जाने से जोड़ों की रचना में विकृति पैदा होती है | हड्ड्यों के बिच का जोड़ एक झिल्ली से बनी थैली में रहता है | जिसे सायोवियल कोष या आरटीक्युलेट कोष कहते है | जोड़ो की छोटी-छोटी रचनाएँ इसी कोष में रहती हैं | हड्डियों के बिच घर्षण न हों इसलिए जोड़ों में हड्डियों के किनारे लचीले और नर्म होते है | यहाँ पर एक प्रकार की नर्म हड्डियाँ रहती है जिन्हें कार्टिलेज या आरटीक्युलेट कहते है | जो हड्डियों को रगड़ खाने से बचाती है | पुरे जोड़ को घेरे हुए एक पतली झिल्ली होती है | जिसके कारण जोड़ कीबनावट ठीक रहती है |
अनेक प्रकार की बात व्याधियों में गठिया काफी विषम रोग है, जिसकी चिकित्सा कठिन तो है लेकिन दु: साध्य नहीं है | इस लेख में कुछ ऐसे दिशानिर्देश है जो बीमारी के आगाज से पूर्व अत्यंत उपयोगी सिध्द हो सकते है | गठिया या आमवात रोग जोड़ों के दर्द से संबंधित है जो वर्तमान में युवाओं को भी अपने घर में ले रहा है और युवावस्था में भी लोगों को होने लगा है | इस रोग से पीड़ित लोगों को दैनिक कामकाज में भी बहुत तकलीफ का सामना करना पड़ता है |
बीमारी के बचाव कैसे करे -
गठिया रोग से बचने के लिए इसके कारणों पर ध्यान देना आवश्यक है | यह रोग अनुवांशिक भी हो सकता है | इसलिए अगर परिवार में यह रोग है और एसिड ज्यादा बनता है तो मांस मधपान भरी भोजन इत्यादि की मात्रा कम कर दें एवं योग आसन तथा सही तरीके से नियमित व्यायाम करें | खुली हवा में सैर और संयमित पौष्टिक आहार अपनाएं तो रोग से बचा जा सकता है |
आयुर्वेद के अनुसार हड्डी और जोड़ों में संतुलित वायु का निवास होता है | वायु के असंतुलन से जोड़ भी प्रभावित होते है | अत: वायु गड़बड़ा जाने से जोड़ों की रचना में विकृति पैदा होती है | हड्ड्यों के बिच का जोड़ एक झिल्ली से बनी थैली में रहता है | जिसे सायोवियल कोष या आरटीक्युलेट कोष कहते है | जोड़ो की छोटी-छोटी रचनाएँ इसी कोष में रहती हैं | हड्डियों के बिच घर्षण न हों इसलिए जोड़ों में हड्डियों के किनारे लचीले और नर्म होते है | यहाँ पर एक प्रकार की नर्म हड्डियाँ रहती है जिन्हें कार्टिलेज या आरटीक्युलेट कहते है | जो हड्डियों को रगड़ खाने से बचाती है | पुरे जोड़ को घेरे हुए एक पतली झिल्ली होती है | जिसके कारण जोड़ कीबनावट ठीक रहती है |
- जोड़ो में कट-कट सी आवाज आता है, दूसरा जोड़ो की गाठों में सुजन आती है |
- हाथ पैर के जोड़ों में सुजन और दर्द होता है | कभी- कभी रात में तेज दर्द एवं दिन में कम दर्द का आराम होता है |
- पैर के अंगूठों में सुजन सुबह सबेरे तेज पीड़ा होता है | मूत्र कम और पीले रंग का आना.
